भा. कृ. अनु. प.-केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान,शिमला 

आलू का संक्षिप्त वर्णन

आलू (सोलेनम ट्यूबरोसम) गेहूं, मक्का और चावल के बाद सबसे महत्वपूर्ण खाद्य फसलों में से एक है, जो विश्व में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के लिए योगदान दे रहा है। इस सोलेनेसी परिवार की कंद फसल की लगभग 200 जंगली प्रजातियां हैं। दक्षिणी अमेरिका की उच्च रेडियन पहाड़ियों से इसकी उत्पत्ति हुई, जहां से पहली बार 16वीं सदी के अन्त में स्पेनिश विजेताओं के माध्यम से यूरोप में इसकी शुरूआत हुई। वहां पर आलू को एक शीतोष्ण फसल के रूप में विकसित किया गया और बाद में यूरोपीय देशों के औपनिवेशिक विस्तार के परिणामस्वरूप इसे बड़े पैमाने पर दुनिया भर में किया गया। भारत में संभवतया इसे 17 वीं सदी तक ब्रिटिश मिशनरियों या पुर्तगाली व्यापारियों के माध्यम से लाया गया।

  • आलू फसल एवं खाद्य

आलू एक वार्षिक, शाकीय, द्विबीजपत्री और वनस्पति तरीके से उगाया जाने वाला पौधा है। इसको वनस्पति बीज जिसे ”सत्य आलू बीज” (टी.पी.एस.) के नाम से जाना जाता है, के द्वारा भी उगाया जा सकता है। आलू कंद एक परिवर्तित तना है जिसे जमीन के नीचे भूस्तरी कहलाने वाली एक विशेष संरचना में विकसित किया जाता है। इसमें सुसुप्त कली (आँख) एवं परतदार पत्तियों (भौं) की तरह एक सामान्य तने के सभी गुण पाये जाते हैं। आलू कंद एक स्थूल जींस है जो मौजूदा वातावरण में इसकी दृढ़ता से प्रतिक्रिया करता है इस प्रकार इसके उचित भंडारण की आवश्यकता है। आलू अत्यधिक पौष्टिक, आसानी से पचने वाला, पौष्टिक कार्बोहाइडेट, प्रोटीन, खनिज पदार्थ, विटामिन एवं उच्च गुणवत्ता वाले आहार फाइबर युक्त सम्पूर्ण भोजन है। एक आलू कंद में लगभग 80 प्रतिशत जल तथा 20 प्रतिशत शुष्क पदार्थ जिसमें 14 प्रतिशत स्टार्च, 2 प्रतिशत प्रोटीन, 1 प्रतिशत खनिज, 0.6 प्रतिशत रेशा, 0.1 प्रतिशत वसा होती है, तथा विटामिन बी एवं सी पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। इस प्रकार, अनाज और सब्जियों की तुलना में आलू अधिक पोषण प्रदान करता है। भारत में बढ़ती हुई जनसंख्या एवं कृषि योग्य भूमि के कम होने को ध्यान में रखते हुए, इस स्थिति से निपटने के लिए आलू एक बेहतर विकल्प है।

  • भारत में आलू

यूरोप में आलू की फसल गर्मियों के मौसम में 14 घंटे की लंबी प्रकाशअवधि में उगाई जाती है तथा फसलावधि 140 से 180 दिन की होती है। हांलाकि, भारतीय मैदानों में आलू, पूरी तरह से विषम परिस्थितियों में उगाया जाता है। फसल का लगभग 85 प्रतिशत भाग सर्दियों में कम प्रकाश अवधि (10 से 11 घंटे की सूर्य की रोशनी में) उगाया जाता है तथा फसलावधि भी छोटी एवं हल्की सर्दियों के कारण 90 से 100 दिन की होती है। सुबह को आमतौर पर कोहरा होता है, जो कि संश्लेषण गतिविधि पर धूप के घंटो को कम कर गंभीर बाधाएं पैदा करता है। इसके अलावा, फसलोत्तर अवधि लंबे समय तक गर्मी में होने के कारण, भंडारण की समस्याएं पैदा करती हैं। इन सभी समस्याओं के साथ भारत में उपोष्ण कटिबंधीय परिस्थितियों के अर्न्तगत आलू उत्पादन के लिए उपयुक्त किस्मों एवं तकनीकों की आवश्यकता है। स्वदेशी आलू अनुसंधान एवं विकास कार्यक्रमों को आरम्भ करने की आवश्यकता महसूस करते हुए तद्नुसार सन् 1949 में पटना में केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान की स्थापना की गई। संकरण एवं बीज स्वास्थ्य के रखरखाव को सुगम बनाने के लिए बाद में क्रमानुसार इसका मुख्यालय शिमला में स्थानान्तरित कर दिया गया। सन् 1971 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आई.सी.ए.आर.) के तत्वाधान में देश में विविध कृषि पारिस्थितिक क्षेत्रों में आलू अनुसंधान एवं विकास में समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान में  आलू पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (ए.र्आई.सी.आर.पी.) आरम्भ की गई। भारत में छः दशकों से अधिक की आलू अनुसंधान की सफलता की कहानी उल्लेखनीय है। सन् 1949-50 में क्षेत्रफल, उत्पादन एवं उत्पादकता की तुलना में, इस अवधि में क्रमशः 900 प्रतिशत, 2819 प्रतिशत एवं 312 प्रतिशत की वृद्धि हुई। भारत अब 206 कु./हेक्‍टेयर आलू की औसत उपज के साथ विश्व में, क्षेत्रफल (2.11 मिलियन हेक्‍टेयर) की दृष्टि से तीसरे स्थान पर तथा उत्पादन (43.42 मिलियन टन) की दृष्टि से दूसरे स्थान पर है। जो कि केवल देश में ही विकसित की गई आलू की प्रौद्योगिकियों के कारण ऐसा हुआ है कि पिछले पांच दशकों के दौरान भारत में आलू के क्षेत्र में, उत्पादन एवं उत्पादकता में शानदार बढ़ोत्तरी दर्ज की गई।

भारत में आलू अनुसंधान की प्रमुख उपलब्धियां निम्न प्रकार हैः

  • प्रजातीय सुधार

देश के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए अब तक 52 आलू की किस्में तैयार की जा चुकी हैं जिनमें से केवल 28 किस्मों को उत्तर भारत के मैदानीं इलाकों के लिए तैयार किया गया है। किस्मों को उत्तर भारत की पहाड़ियों तथा अन्य विशिष्ट समस्याग्रस्त क्षेत्रों जैसे- सिक्किम, उत्तरी बंगाल की पहाड़ियों एवं दक्षिणी की पहाड़ियों के लिए विकसित किया गया है। 51 विकसित किस्मों में से, 19 विभिन्न जैविक एवं अजैविक तनाव के लिए प्रतिरोधी है। इसके अलावा, 9 प्रजातियां – कुफरी चिप्सोना-1, कुफरी चिप्सोना-2, कुफरी चिप्सोना-3, कुफरी हिमसोना, कुफरी फ्राईसोना, कुफरी ज्योति, कुफरी चन्द्रमुखी, कुफरी लवकार एवं कुफरी सूर्या आदि प्रसंस्करण के उद्देश्य से उपयुक्त हैं। इन सभी किस्मों को तीन परिपक्वता वाले समूह जैसे- अगेती (70 से 80 दिन), मध्यम (90 से 100 दिन) तथा पिछेता (110 से 120 दिन) में रखा गया है। केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित की गई किसमों को भारत के साथ-साथ कई पड़ोसी देशों में उगाया जाता है। आलू की किस्म कुफरी चन्द्रमुखी को अफगानिस्तान में, कुफरी ज्योति को नेपाल एवं भूटान में, तथा कुफरी सिन्दूरी को बंगला देश एवं नेपाल में उगाया जाता है। इसके अलावा, पांच भारतीय संकर प्रजातियों को व्यावसायिक रूप से श्रीलंका, मेडागास्कर, मैक्सिकों एवं फिलीपीन्स में भी बोया जाता है।

  • सीड प्‍लाट तकनीक

इस तकनीक को सन् 1970 के दशक में कम माहूं अवधि के तहत् उपोष्णीय भारतीय मैदानों में स्वस्थ बीज आलू उत्पादन को सक्षम बनाने के लिए विकसित किया गया। जैव-प्रौद्योगिकी दृष्टिकोण द्वारा सहायता प्राप्त यह तकनीक विषाणु निदान, सूक्ष्म प्रजनन एवं प्रभावी वायरल निदान से 3000 टन वार्षिक प्रजनक बीज का उत्पादन करके राष्ट्रीय बीज आलू उत्पादन कार्यक्रम को कायम किये हुए है। कृषि/बागवानी के राजकीय वि‍भागों द्वारा इस प्रजनक बीज को फिर से लगभग 6,48,000 टन प्रमाणित बीज के रूप में गुणन किया जाता है। इस प्रकार देश लगभग 300 मिलियन अमेरिकी डालर की बचत होती है क्‍योंकि अधिकांश ऐशियाई देशों जैसे-पाकिस्‍तान, बंगलादेश यहां तक कि चीन में यूरोप से बीज आलू का आयात होता है। बीज प्रक्षेत्र तकनीक द्वारा भारत में पहाड़ियों से मैदानी इलाकों में आलू प्रजनन का विकेन्‍द्रीकरण करके देश के विभिन्‍न कृषि जलवायु क्षेत्रों के लिए उपयुक्त किस्मों को विकसित करने में सक्षम बनाया है। बीज आलू उत्पादन के अर्न्तगत क्षेत्रफल में कई गुणा वृद्धि से हमारा देश बीज आलू की उपलब्‍धता में सक्षम बन गया है।

  • ऊतक संवर्धन

विभज्योत्मक कल्चर एवं सूक्ष्म प्रजनन की इन विट्रो तकनीक का प्रयोग कर बीज स्वास्थ्य स्तर में सुधार करने एवं प्रजनक बीज का उत्पादन करने के लिए आवश्यक समय को कम करने हेतु प्रयास किये जा रहे हैं। वर्तमान में, लगभग 5 प्रतिशत प्रजनक बीज उत्पादन कार्यक्रम, ऊतक संवर्धन के माध्यम से उत्पादित सूक्ष्म कंद द्वारा प्रतिवर्ष आपूर्ति की जाती है। आने वाले वर्षो में 100 प्रतिशत प्रजनक बीज को ऊतक संवर्धन द्वारा पैदा की गई सामग्री के माध्यम से उगाने का प्रस्ताव है।

  • कृषि-तकनीक

विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में आलू उत्पादन के लिए विविध पद्धतियों के विकास द्वारा इन क्षेत्रों में आलू की उत्पादकता में सुधार लाने में मदद मिली है। आलू की फसल का निवेश गहन है तथा इससे उच्च उत्पादकता प्राप्त करने के लिए इसके इष्टतम कृषि क्रियाओं की आवश्यकता है। फसल की वृद्धि एवं विकास जैसे-पूर्व उद्गमन, कंद आरम्भ होने से उद्गमन तक, कंद आरम्भ होने से कंद बढ़वार तथा बढ़वार की समाप्ति तक का इष्टतम कृषि क्रियाओं को फलाद्रमिकी चरणों (delineated phenological phases) के वर्णन करने पर निर्भर करता है।

कृषि क्रियाओं को एक प्रकार से भारतीय मैदानों के लिए समायोजित किया जा रहा है ताकि कंद की शुरूआत एवं विकास उस अवधि से मेल खाये जब रात्रि का तापक्रम 20 डिग्री सेल्सीयस से कम तथा दिन का तापक्रम 30 डिग्री सेल्सीयस से नीचे हो। कंद के आरम्भ होने से कंद बढ़वार तक का फलाद्रमिकी चरण मुख्य रूप से पोषण एवं नमी पर निर्भर है। इस उद्देश्य के लिए, अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (आलू) के अर्न्तगत बहु स्थानीय परीक्षणों के माध्यम से विभिन्न कृषि जलवायु क्षेत्रों में उर्वरक एवं सिंचाई की आवश्यकता के लिए कार्य किये गये हैं। कंद स्थूलता की समाप्ति पत्तियों की जीर्णता की शुरूआत से मेल खाती है। पोषण एवं नमी से हेरफेर के द्वारा, रेखीय कंद स्थूलता चरण की निरन्तरता सुनिश्चित करने के लिए पत्तियों की परिपक्वता को धीमा कर दिया जाता है जिसका प्रभाव उच्च पैदावार पर पड़ता है। आलू आधारित कई लाभदायक अन्तः फसलें एवं फसल चक्रों को भी देश के विभिन्न क्षेत्रों के लिए चिन्हित किया गया। आलू की फसल को गेहूं, सरसों एवं गन्ना की अन्तः फसलों के साथ लाभदायक बनाया जा सकता है। यह फसल प्रणालियां मृदा की उर्वरता के रखरखाव में मदद करती हैं तथा इनसे उर्वरकों की बचत, फसल की उपज एवं सकल आय में सुधार आया है। इसके अतिरिक्त, चयनित क्षेत्रों में निर्माण और लागत प्रभावी औजारों और उपकरणों के विकास के माध्यम से आलू की खेती का यंत्रीकरण भी कर दिया गया है।

  • पादप संरक्षण

भारत में आलू के प्रमुख रोगों एवं कीट-पतंगों के लिए प्रभावी प्रबंधन के तरीके तैयार किये गये हैं। पिछेता झुलसा आलू का सबसे भयानक रोग है जो कि पहाड़ियों एवं मैदानों में लगभग प्रति वर्ष आती है। रासायनिक प्रबंधन के उपायों द्वारा, पिछेता झुलसा रोग प्रतिरोधी कई किस्में विकसित की जा चुकी हैं। आलू की ऐसी किस्में विकसित की गई हैं जिनमें मस्सा रोग एवं कवचधारी सूत्रकृमि रोग की प्रतिरोधिता पायी जाती है। कल्चरल एवं जैविक नियंत्रण के उपायों को रोगों एवं कीट-पतंगों पर नियंत्रण करने के लिए विकसित किया गया। पहाड़ियों एवं मैदानों के लिए पिछेता झुलसा रोग के पूर्वानुमान के लिए विकसित प्रणाली पिछेता झुलसा रोग के आने के पूर्व चेतावनी की क्रियाविधि के लिए सक्षम है।

भंडारण

यूरोपीय देशों में, आलू की फसल गर्मी के मौसम में उगाई जाती है तथा मुख्य भंडारण का मौसम सर्दियों में होता है। जबकि, भारत में, 85 प्रतिशत आलू सर्दियों में बोया जाता है तथा इसका भंडारण लंबी अवधि वाले गर्मी के दिनों में होता है। आलू के भंडारण के लिए इसे 2-4 डिग्री सेन्टीग्रेड तापक्रम पर, शीतगृह में रखने की आवश्यकता है जिसमें पर्याप्त लागत आती है। इसके कारण आलू कंदों में से शर्करा का संचय भी हो जाता है। जबकि, भारत में बहुत सारी कम लागत वाली पारम्परिक एवं गैर प्रशीतित भंडारण संरचनाएं (अनिवार्य रूप से वाष्पीकरणीय या निष्क्रिय वाष्पीकरण पर आधारित) सफलतापूर्वक प्रयोग में लायी जाती हैं। इन विशेष क्षेत्रों के लिए मान्य एवं लोकप्रिय इन पारम्परिक संरचनाओं का अध्ययन किया गया है। गैर प्रशीतित भंडारण में, अत्यधिक वजन को कम होने से रोकने के लिए अंकुरण के कारण सिकुड़न को रोकने के लिए अंकुरण रोकने का उपयोग भी लोकप्रिय है। जिसके लिए सी.आई.पी.सी. (isopropyl-N-chlorophenyl carbamate) सबसे प्रभावी अकुंर अवरोधी है जब इसका अनुप्रयोग 25 मि.ग्रा./प्रति किलोग्राम कंद की दर से किया जाता है।

  • प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन

कच्चे माल की खपत के अलावा, आलू को कई उत्पादों जैसे चिप्स, फ्रैन्च फ्राईज, क्यूब्स, कणिकाओं एवं डिब्बाबंद उत्पादों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। आलू प्रसंस्करण के लिए उच्च शुष्क पदार्थ एवं अवकारक शर्करा की मात्रा के लिए प्राथमिक निर्धारक शामिल हैं। चिप्स, फ्रैन्च फ्राईज एवं निर्जलित (सुखाये गये) उत्पादों के लिए आलू में 20 प्रतिशत से अधिक शुष्क पदार्थ वांछनीय हैं। इसी प्रकार, कंदों में अवकारक शर्करा की मात्रा 100 मिग्री/100 ग्राम ताजा भार प्रसंस्करण के लिए स्वीकार्य माना जाता है। आलू की 9 किस्में अर्थात् कुफरी चिप्सोना-1, कुफरी चिप्सोना-2, कुफरी चिप्सोना-3, कुफरी ज्योति, कुफरी चन्द्रमुखी, कुफरी लवकार, कुफरी सूर्या, कुफरी हिमसोना एवं  कुफरी फ्राईसोना प्रसंस्करण के उद्देश्य से विकसित की गई हैं। भारत में, संगठित क्षेत्र में आलू प्रसंस्करण लगभग एक दशक पहले शुरू किया गया, तथा वर्तमान में केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित की गई मुख्य रूप से तीन देशी आलू प्रसंस्करण किस्में अर्थात् कुफरी चिप्सोना-1 एवं कुफरी चिप्सोना-3 के कारण इस क्षेत्र का प्रसार हुआ। आजकल इन दोनों किस्मों का इस्तेमाल उद्योगों द्वारा प्रसंस्करण हेतु चिप्स एवं फ्रैन्च फ्राईज के लिए किया जा रहा है।

  • कम्प्यूटर अनुप्रयोग

सिमुलेशन मॉडलिंग अब व्यापक रूप से विभिन्न विषयों में रणनीतिक निर्णयों पर कार्य करने के लिए इस्तेमाल की जाती है। केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने आलू की वृद्धि एवं विकास के अनुकरण करने के लिए, सबसे अच्छी बढ़वार अवधि निर्धारित करने, विभिन्न कृषि पारिस्थितिक क्षेत्रों के अर्न्तगत प्रबंधन के तरीकों का अनुकूलन करने के लिए, तथा सही पैदावार के अनुमान की भविष्यवाणी करने के लिए इन्फोक्रोप-आलू प्रतिमान विकसित किया। एक विशेषज्ञ प्रणाली/डी.एस.एस. अर्थात् आलू कीट प्रबंधक, फसल निर्धारण के लिए कम्प्यूटर सहायता प्राप्त सलाहकार प्रणाली, आलू बढ़वार अवधि एवं फसल अनुमानक (सी.ए.ए.एस.पी.एस.), प्रसंशनीय आलू बढ़वार मौसम अनुमानक (पी.पी.जी..एस.ई.), आलू की संभावित उपज, तनाव डिग्री घंटे, पीडेज एवं बढ़ते हुए तापक्रम वाले दिनों का आकलन उपकरण, आलू खरपतवार प्रबंधक, नाईट्रोजन प्रबंधन के लिए सलाहकार प्रणाली, आलू बढ़वार मौसम का वर्णनकर्ता, ईन्डो बलाइट कास्ट-आलू पिछेता झुलसा का पूर्वानुमान करने वाली प्रणाली आदि को केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित किया गया।

  • प्रौद्योगिकी का हस्तान्तरण

अनुसंधान उपलब्धियां अकेले कृषि प्रणाली की सफलता का अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अनुसंधान सूचना को इसके एक प्रौद्योगिकी के रूप में चिन्हित किये जाने से पहले अनुकूल अनुसंधान के माध्यम से विभिन्न जैव भौतिकी एवं सामाजिक आर्थिक स्थितियों के तहत् इसका मूल्यांकन एवं परिष्कृत किये जाने की आवश्यकता है। इस संबंध में, केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान द्वारा अखिल भारतीय फसल अनुसंधान परियोजना (आलू) एवं टी.ओ.टी परियोजनाओं के अर्न्तगत शुरू किये गये बहु स्थानीय परीक्षण जैसे कि परिचालन अनुसंधान परियोजना (ओ.आर.पी.), लैब टू लैंड कार्यक्रम (एल.एल.पी.), जनजातीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम एवं संस्थान तथा गांव से जुड़े कार्यक्रम (आई.वी.एल.पी.), क्षेत्र एवं उपयुक्त प्रौद्योगिकियों के विकास से प्रतिक्रिया प्राप्त करने में मील का पत्थर साबित हुए है। उपयोगकर्ताओं के लिए प्रौद्यागिकी के हस्तान्तरण का अन्त जिसमें घटकों एवं आयामों की बहुत सारी संख्या शामिल है, एक जटिल कार्य है। महत्वपूर्ण घटकों में से एक है प्रौद्योगिकी उत्पादन प्रणाली एवं ग्राहक प्रणाली के बीच उचित संबंध बनाये रखना। इस संबंध में, नवीनतम दृष्टिकोण जैसे आवश्यकता के आकलन, सहभागितापूर्ण योजना एवं कार्यान्वयन, तथा किसानों/ग्राहकों द्वारा वैज्ञानिक-किसान का सीधा संपर्क तीव्र होने से तकनीकों को अपनाने के फलस्वरूप प्रचार-प्रसार में मदद मिली है। केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान ने प्रदर्शनों, प्रशिक्षणों, किसान मेलों, आकाशवाणी पर आलू पाठशाला, आलू साहित्य की आपूर्ति तथा अन्य प्रसार गतिविधयों के माध्यम से किसानों के साथ सीधा संवाद स्थापित किया है। इसके अतिरिक्त, सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को मापने एवं आलू प्रौद्योगिकी के हस्तान्तरण में आने वाली बाधाओं को भी अध्ययन आयोजित किये जा रहे हैं।

  • आलू का निर्यात

यद्यपि भारत विश्व के कुल आलू उत्पादन में 7.55 प्रतिशत का योगदान देता है, दुनिया के निर्यात में 0.7 प्रतिशत की यह हिस्सेदारी काफी नगण्य है। भारतीय आलू निषिद्ध रोगों जैसे मस्सा रोग, काली रूसी, एवं कीट रोग जैसे कंद कीट एवं सूत्रकृमि, जो कि पादप स्वच्छता मानकों के लिए मापदंड़ हैं, से वास्तव में मुक्त है। जनवरी से जून के दौरान जब यूरोपियन देशों से आपूर्ति कम हो जाती है, भारत द्वारा ताजा भोज्य आलू का निर्यात करने से भारत को प्राकृतिक लाभ भी हुआ है। इससे पूरे वर्ष ताजा आलू की आपूर्ति की जा सकती है क्योंकि भारत में विभिन्न कृषि जलवायु हैं तथा आलू की पूरे वर्ष देश के एक भाग से दूसरे भाग में पैदावार की जाती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के बदले हुए परिदृश्य के तहत् भारत में आलू का अच्छा भविष्य है। कई विकासशील देशों में वैश्वीकरण के कारण अन्तर्राष्ट्रीय आलू व्यापार और अधिक एकीकृत हुआ है। कृषि पर मात्रात्मक प्रतिबंध की चरणबद्धता के साथ, आयातीत एवं निर्यातीत देशों के बीच आलू का आयात एवं निर्यात कीमत एवं उत्पादन लागत के अंतर के आधार पर किया जाएगा। सस्ते श्रमिकों की उपलब्धता के परिणामस्वरूप देश में निम्न उत्पादन लागत के कारण, भारत को अन्तर्राष्ट्रीय आलू व्यापार में प्रतिस्पर्धात्मक लाभ होगा।

  • नई सहस्राब्दी में आलू

भारत में लोगों के जीवन स्तर में सुधार के साथ, खानपान की आदतें अनाजों से सब्जियों की ओर परिवर्तित हो जायेगीं। ऐसी स्थिति में यह अनुमान है कि भारत को सन् 2020 तक 49 लाख टन आलू का उत्पादन करना होगा। इस लक्ष्य को केवल उत्पादकता स्तर में सुधार के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। भारत में आलू की उत्पादकता 183.3 क्वि./हेक्‍टेयर है, जो कि बेल्जियम की उत्पादकता 490 कु./हेक्‍टेयर, न्यूजीलैंड़ की उत्पादकता 450 कु./हेक्‍टेयर, ब्रिटेन की उत्पादकता 397 कु./हेक्‍टेयर तथा संयुक्त राज्य अमेरिका की उत्पादकता 383 कु./हेक्‍टेयर से काफी कम है। भारत में फसल अवधि कम होने के कारण से ऐसा है। देश के विभिन्न पारिस्थितिक क्षेत्रों में व्यापक बदलाव देखने को मिलता है, जिसके कारण अलग-अलग राज्यों के उत्पादकता स्तर में व्यापक अंतर है (तालिका-2)। इसलिए, हमारे सभी प्रयासों में स्थान विशिष्ट एवं समस्या विशिष्ट किस्मों एवं प्रौद्योगिकियों का विकास करने पर ध्यान दिया गया है। भारत में अधिकांश लोगों को आलू के पोषक मूल्य के बारे में या तो कोई ज्ञान नहीं है या फिर उनकी गलत धारणाएं हैं। इसमें कम वसा एवं कैलोरी सामग्री (0.1 प्रतिशत) होने के कारण इससे मोटापा नहीं होता है। आलू की खपत की गलत धारण के कारण, भारत में आलू की प्रति व्यक्ति खपत लगभग 16 किग्रा/प्रतिवर्ष है। दूसरी ओर, यूरोप में आलू की प्रति व्यक्ति खपत 121 किग्रा/प्रतिवर्ष तथा पोलैंड में आलू की प्रति व्यक्ति खपत 136 किग्रा/प्रतिवर्ष अधिकतम है। इसलिए, भारत में आलू की खपत में सुधार के लिए पर्याप्त गुंजाईश है। इस उद्देश्य के लिए, अंड़े एवं दूध की तरह प्रचार के बड़े साधन जैसे दूरदर्शन, रेडियों एवं समाचार पत्रों के माध्यम से इसके पोषण तत्वों पर प्रकाश डालते हुए एक प्रचार अभियान शुरू किये जाने की आवश्यकता है। इसके अलावा, अधिशेष आलुओं को पशुओं के चारे के रूप इस्तेमाल करने की संभावना का पता लगाये जाने की आवश्यकता है। देश में खुदाई के उपरान्त अतिरिक्त आलुओं को 2-4 डिग्री सेन्टीग्रेड तापक्रम पर शीतगृह में भंड़ारित कर दिया  जाता है। इस प्रकार भंड़ारित किये गये आलू प्रसंस्करण के अयोग्य होते हैं तथा शर्करा अवयवों के संचयन के कारण भोज्य आलू के लिए इनकी वरीयता खत्म हो जाती है। आलू को मिठापन से बचाने के लिए आलू को 10-12 डिग्री सेल्सीयस तापक्रम पर भंड़ारित किये जाने की आवश्यकता है। केवल बीज आलुओं को ही 2-4 डिग्री सेल्सीयस तापक्रम पर शीतग्रह में भंड़ारित किया जाना चाहिए। ऐसा करने से भंड़ारग्रह का कम से कम 60 प्रतिशत स्थान खाली हो जाएगा जिसे ऊर्जा एवं भंडारण की लागत पर काफी बचत के लिए अग्रणी 10-12 डिग्री सेल्सीयस तापक्रम पर सी.आई.पी.सी. उपचार के साथ प्रसंस्करण के लिए आलू भंड़ार एवं छोटे आलुओं के लिए परिवर्तित किया जा सकता है। विश्व की अर्थव्यवस्था में आलू प्रसंस्करण के लिए तेजी से बढ़ता हुआ क्षेत्र है। बढ़ते हुए शहरीकरण के कारण, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि एवं पर्यटन का विस्तार होने से, भारत एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में  प्रसंस्‍कृत आलू उत्पादों की मांग तीव्र गति से बढ़ी है। हालांकि भारत में, आलू प्रसंस्करण का कुल वार्षिक उत्पादन के 2 प्रतिशत से कम है जो कि संयुक्त राज्य अमेरिका में 60 प्रतिशत, नीदरलैंड़ में 47 प्रतिशत तथा चीन में 22 प्रतिशत की तुलना में कम है। इसलिए, भारत में आलू प्रसंस्करण उद्योगों को विस्तारित करने तथा प्रसंस्करण उत्पादों-आटा, क्यूब्स, कणिकाओं, लच्‍छे एवं स्टार्च में विविधता लाये जाने की अपार संभावनाएं हैं। बदलते वैश्विक परिदृश्य के तहत्, आलू उत्पादन एवं उपयोग पद्धति बहुत तेजी से बदल रही है। ये परिवर्तन कई अवसरो को आश्रय देते हैं जिन्हें प्रभावी प्रसार प्रणाली के द्वारा उपयोग किया जा सकता है। आधुनिक सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल समकालीन समय में जागरूकता पैदा करने के लिए अत्यधिक प्रासंगिक है। बिचौलियों, जिनसे जानकारी में विकृति पैदा होती है, को नष्ट करके यह अंतिम उपयोगकर्ता तक सीधे पहुंचने के लिए हमें सक्षम बनायेगा। आलू उत्पादन एवं विपणन के संबंध में क्रमानुसार आलू उत्पादकों के बीच उद्यमशीलता को बढ़ावा देने के लिए आलू आधारित कार्यनीतियों को प्राप्त करने के लिए प्रयास किये जाने की आवश्यकता है।