भा. कृ. अनु. प.-केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान,शिमला 

आलू के जर्मप्लाज़्म/प्रजातियों को आयात करने की प्रक्रिया

 

आलू के जर्मप्लाज़्म/प्रजातियों को आयात करने की प्रक्रिया

 

केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान शिमला, आलू की प्रजातियों का आयात करने और उनका संगरोध बाध्यता करने की नोडल एजेंसी है। तथापि, ऐसी सामग्री को केवल अनुसंधान के लिए आयात किया जा सकता है और फिर बीज को (केवल विनियमित वातावरण में मिनिट्यूबर के रूप में बहुगुणित कर दिए जाने के बाद ही) उसका निर्यात किया जा सकता है। यह अनिवार्य है कि मांगकर्ता यह जिम्मेदारी ले कि इस सामग्री का व्यावसायिक तौर पर अनुचित उपयोग नहीं किया जाएगा, अर्थात् भारत सरकार की अधिसूचना के द्वारा ही, इसे किसानों को उपलब्ध कराना अनिवार्य है।

आलू की प्रजातियों/अनुवृद्धियों के आयात करने में उठाए जाने वाले कदम इस प्रकार हैः

  1. 1. मांगकर्ता निदेशक, केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला, को अपनी आवश्यकता इन बातों का उल्लेख करते हुए भेजे कि आयात की जाने वाली प्रजातियों का नाम क्या है और जिस स्रोत-संस्थान से उन्हें मंगाया जाना है उनका पूरा नाम व पता क्या है। मांगकर्ता को यह भी उल्लेख करना होगा कि वह किस्म/अनुवृद्धि क्या पराजीनी/आनुवंशिक तौर पर संशोधित है या नहीं? मांगकर्ता को स्रोत-संस्थान से यह प्रमाणपत्र भी हासिल करना होगा कि मंगाई जा रही प्रजाति/अनुवृद्धि में किसी तरह का कोई टर्मिनेटर जीन तो नहीं है।

 

  1. 2. मांगकर्ता द्वारा आवश्यक दस्तावेज़ों तथा एमओयू पर हस्ताक्षर कर देने तथा लागत को वहन करने के लिए सहमति देने के बाद, सीपीआरआई आयात की अनुमति के लिए निदेशक, राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (नेशनल ब्यूरो ऑफ़ प्लांट जेनेटिक रिसोर्सिस), नई दिल्ली को आवेदन भेजता है। आयात यदि ट्रंसजेनिक प्रकार का है तो एक आवेदन आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों पर विनियामक समिति (आरसीजीएम) को भी भेजा जाएगा। आवश्यक अनुमति/आयात अनुमति-पत्र आने में आमतौर पर 1-2 महीने लग जाते हैं।
  2. 3. इस मांग पत्र को आयात अनुमति एवं पादप स्वच्छता प्रमाण-पत्र के साथ सामग्री की आपूर्ति करने के लिए स्रोत-संस्थान को भेज दिया जाता है। उक्त सामग्री को नेशनल ब्यूरो ऑफ़ प्लांट जेनेटिक रिर्सोसेज़ नई दिल्ली को भेजा जाएगा ताकि वह उसे आगे सीपीआरआई को भेज दे।
  3. 4. सामग्री प्राप्त हो जाने पर, उसे संगरोध के लिए तैयार किया जाएगा। इन-विट्रो पौधों के मामले में, पौधों का पुनरूद्धार और सूक्ष्म प्रजनन शामिल है। इसमें आमतौर पर 2-3 महीने लग जाते हैं।
  4. 5. इस तैयार सामग्री को सभी कीटों पर आज़माया जाता है। आमतौर पर इसमें 4-5 महीनों का समय लग जाता है।
  5. 6. यह सामग्री यदि सभी प्रकार के कीटों से मुक्त पाई जाती है, तो इसे गुणन (मल्टीप्लाई) करके मांगकर्ता को भेज दिया जाता है, अन्यथा इसे नष्ट कर दिया जाता है। आमतौर पर इस काम में भी 1-2 महीने लग जाते हैं। इस प्रकार, सीपीआरआई में इस सामग्री को प्राप्त कर लेने के दिनांक से इसे हरी झंडी देने तक 7-8 महीने लग ही जाते हैं।
  6. 7. इस सामग्री पर अनुसंधान करने और इसे विकसित करके उपयोग में लाने में केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला को असीमित अधिकार प्राप्त हैं।