भा. कृ. अनु. प.-केन्द्रीय आलू अनुसंधान संस्थान,शिमला 

आलू को जानें

आलू को जानें

 

आलू क्या है ?

आलू एक कंद है जो कि पौधे के एक विशेष भाग (भूमिगत तना) पर भूमि के अंदर उगता है जिसे स्टोलॉन (भूस्तारी) कहते हैं। अतः शुद्ध वानस्पतिक तौर पर यह एक संशोधित तना (मॉडिफाइड स्टेम) होता है। आलू का कंद सामान्यतः आकार में अंडाकार से लेकर गोलाकार होता है हालांकि इनके बीच के आकार के कंद भी अक्सर देखने को मिलते हैं। इसमें भीतरी गूदा तथा एक बाहरी रक्षात्मक परत (छिलका) होती है जिसे त्वचा कहते हैं। गूदे के रंग तथा छिलके की सज्जा (फिनिश) में बहुत अंतर होता है। और यही दो लक्षण हैं जो संपूर्ण तौर पर न सही किंतु व्यापक रूप से उपभोक्ताओं की पसंद या स्वीकार्यता को निर्धारित करते हैं। आलू के कंद पर आँख के आकार के गड्ढे आँख कहलाते हैं जो वास्तव में सुषुप्त कलिकाएं होती हैं जो अनुकूल दशाओं में नए प्ररोहों को जन्म देती हैं। ये सफेद से क्रीमी सफेद रंग या रंजित नए प्ररोहों को अंकुआ या अंकुर कहते हैं। आलू में यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है, क्योंकि अंकुरित आलू को उपभोग के लिए स्वीकार्य नहीं किया जाता है। किंतु जब कंदों को प्रवर्धन के लिए उपयोग में लाना होता है तो यही अनुकूलतम अंकुरण का गुण एक वांछित विशिष्टता मानी जाती है।

पौधे में आलू का बनना और इसके विकास को कंदीकरण (ट्यूबराइजेशन) कहते हैं। एक आलू के पौधे में कंद बनने तभी प्रारंभ होते हैं जब दो विशिष्ट पर्यावरणीय दशाएं मिलती हैं। इनमें छोटे प्रकाश अवधि वाले दिन (डेलाइट) तथा रात का ठंडा तापमान शामिल हैं। क्योंकि इस प्रकार की पर्यावरणीय दशाएं सिंधु-गंगा के उपोष्णीय मैदानी भागों में केवल शीतकाल के दौरान उपलब्ध होती हैं, अतः आलू को इसी मौसम में उगाया जाता है। और यही कारण है कि भारत में आलू उगाए जाने की मौसमी दशाएं यूरोप और उत्तरी अमेरिका जैसे शीतोष्ण देशों से बिल्कुल अलग हैं। तथापि, समशीतोष्ण आलू उगाने की परिस्थितियां भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में भी उपलब्ध हैं तथा इसे वहां गर्मी के दौरान उगाया जाता है। किंतु इस प्रकार के समशीतोष्ण आलू उत्पादन का कुल उत्पादन में केवल 8-10 प्रतिशत तक का ही योगदान है। भारत में इसलिए आलू को एक लघु-अवधि वाली फसल माना जाता है जिसका औसत फसल काल 90-100 दिनों तक का होता है।

अधिकतर प्रमुख खाद्य फसलों (अनाजों) जिन्हें बीज के द्वारा (लैंगिक संकरण के उत्पाद) प्रवर्धित किया जाता है, के विपरीत आलू का पौधा कंदों के द्वारा प्रवर्धित किया जाता है। प्रवर्धन के लिए उपयोग में लाए जाने वाले कंद को बीज कंद या आलू का बीज कहते हैं। प्रवर्धन की इस विधि में लैंगिक संकरण या प्रक्रिया सम्मिलित नहीं होती है इसलिए इसे अलैंगिक या वानस्पतिक प्रवर्धन कहते हैं। इस प्रकार के प्रवर्धन के अपने गुण और दोष होते हैं। इसका मुख्य लाभ यह होता है कि इसमें एक अच्छे आलू के प्रतिरूप (क्लोन) की आनुवंशिक शुद्धता की उच्च डिग्री को बनाए रखा जा सकता है। अक्सर आलू के पौधे को सामान्य बोलचाल की भाषा में एक कृन्तक (क्लोन) कहा जाता है, क्योंकि इसे कृन्तक प्रवर्धन द्वारा पीढ़ियों तक विकसित किया जाता है, जो कि अलैंगिक या वानस्पतिक प्रवर्धन का एक दूसरा नाम है। इसमें नुकसान यह होता है कि कई घातक वायरस और बीज-जनित रोगाणु कंदों में लगातार संचित होते रहते हैं तथा इनके आवर्ती बहुगुणन के परिणामस्वरूप एक कृन्तक में धीरे-धीरे विकार आ जाता है।  इस कारण से, आलू की सफल खेती और उत्पादन, रोग-मुक्त उच्च गुणवत्ता वाले बीज कंदों की उपलब्धता पर निर्भर करता है। विशेषकर भारत में प्रचलित उष्ण तथा उपोष्ण  गर्म जलवायु में यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जहां वायरस संचारण के लिए उत्तरदायी विभिन्न प्रकार के रोगवाहकों (वैक्टर) जैसे माहूं, कटुकी, काष्ठ कीटों, सफेद मक्खियों आदि की बहुलता पाई जाती है। इसके फलस्वरूप, कई देशों में अच्छी गुणवत्ता वाले आलू के बीजों की लागत ही कुल उत्पादन लागत का लगभग 40-60 प्रतिशत तक हो जाती है। कंदों के अलावा, आलू के पौधों को इसके वानस्पतिक बीज (बोटेनिकल सीड) द्वारा भी प्रवर्धित किया जा सकता है जिन्हें सत्य आलू बीज (टी.पी.एस.) के नाम से जाना जाता है। ऐसे क्षेत्रों में जहां बीज वाले आलू का उत्पादन करना व्यावहारिक या आर्थिक रूप से संभव नहीं होता, सत्य आलू बीज के प्रवर्धन का एक वैकल्पिक साधन होता है। सत्य आलू बीज (टी.पी.एस.) के द्वारा आलू उत्पादन करने में न केवल उत्पादन लागत में कमी होती है वरन इससे किसान के शुद्ध लाभ में भी वृद्धि पाई गई है। हालांकि, एक या अन्य सस्य-तकनीकी कारणों तथा तकनीकी-आर्थिक समस्याओं के कारण बड़े पैमाने पर व्यावसायिक आलू की खेती के लिए वर्तमान में सत्य आलू बीज (टी.पी.एस.) प्रौद्योगिकी को पूरी तरह से त्रुटि रहित नहीं पाया गया है। क्योंकि आलू बड़े स्तर पर खराब होने वाली फसल है और भारत जैसे उपोष्ण दशाओं वाले देश मे इसकी खुदाई के बाद उच्च तापमान होने के कारण इसके कम तापमान पर भंडारित करने की आवश्यकता होती है। अतः आलू उत्पादन की कुल लागत में इसे उपभोग के लिए बेचने या बीज प्रवर्धन के पूर्व आलू को शीतगृहों में भंडारित किए जाने की लागत भी इसकी कुल लागत में जुड़ जाती है। इसके अतिरिक्त, आलू को सिंधु-गंगा के मैदानी भागों के बड़े हिस्से में पूर्णतः सिंचित दशाओं में उगाया जाता है जिसके अंतर्गत सर्वाधिक उत्पादकता प्राप्त करने के लिए ईष्टतम कृषि क्रियाओं को अपनाने की जरूरत होती है। यह सब मिलकर आलू की खेती को एक उच्च निवेश-सघनता वाली फसल बना देते हैं।

आलू में क्या पाया जाता है ?

आलू के कंद में लगभग 80 प्रतिशत जल तथा शेष शुष्क पदार्थ (ड्राई मैटर) होता है। एक प्रकार का भंडारित ऊतक (स्टोरेज टिश्यू) जिसे मृदूतक (पेरेनकाइमा) कहते हैं, वह आलू के कंद का मुख्य भाग होता है। जटिल कार्बोहाइड्रेट्स, स्टार्च अनाज भी इस ऊतक के भीतर आरक्षित सामग्री के रूप में जमा रहते हैं। शुष्क सामग्री का मुख्य अवयव स्टार्च होता है जो कि कुल ठोस पदार्थ का लगभग 70 प्रतिशत तक होता है। अनाज वाली फसलों जैसे चावल तथा गेहूं से आलू को इसके शुष्क सामग्री उत्पन्न करने की उच्च क्षमता द्वारा पहचाना जा सकता है जो कि लगभग 47.6 किग्रा/हेक्‍टेयर/प्रतिदिन है। आलू के एक कंद में औसत अशोधित सामग्री का संघटन इस प्रकार होता है : शुष्क सामग्री (20 प्रतिशत), स्टार्च (13-16 प्रतिशत), कुल शर्करा (0-2 प्रतिशत), प्रोटीन (2 प्रतिशत), रेशा (0.5 प्रतिशत), लिपिड्स (0.1 प्रतिशत), विटामिन ए (ट्रेस/100 ग्राम ताजा भार), विटामिन सी (31 मिग्रा/100 ग्राम ताजा भार), खनिज (ट्रेस), राख (1-1.5 प्रतिशत), एमाइलोज (22-25 प्रतिशत) तथा ग्लाइको एल्केलॉयड्स (<1 मिग्रा/100 ग्राम ताजा भार) गैर-पोषणिक घटक के रूप में। कुल मिलाकर, वर्तमान समय की आलू की किस्मों में हालांकि नुकसानदायक ग्लाइको एल्केलॉयड्स को मानव उपभोग के लिए अनुमन्य सीमा के भीतर पाया गया है। हाल के वर्षों में, यह सूचित किया गया है कि आलू में एक बहुत हानिकारक विषाक्त रसायन होता है जिसे एक्रिलएमाइड कहते हैं जिसमें आलू को फ्राई करने या इसे प्रसंस्कृत करने पर वृद्धि की प्रवृत्ति पाई गई है। हालांकि, इस संबंध में बिना किसी विस्तृत अध्य्यनों के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
आलू के कंदों में कई प्रकार के बी-ग्रुप विटामिन तथा उच्च गुणवत्तायुक्त आहारीय रेशा भी पाया जाता है। चावल व गेहूं की अपेक्षाकृत आलू से प्रति हेक्‍टेयर प्रति दिन अधिक खाने योग्य प्रोटीन (लगभग 3 किग्रा) प्राप्त होता है। और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आलू से प्राप्त प्रोटीन का जैविक मूल्य एक संपूर्ण अंडे से प्राप्त प्रोटीन का लगभग 71 प्रतिशत होता है, यह एक ऐसा आंकड़ा है जो कि गेहूं, मकई, मटर और बींस से कहीं बेहतर है और यहां तक कि इसकी तुलना दूध से की जा सकती है। इसी प्रकार आलू में खनिजों के उपलब्ध होने की क्षमता भी इतनी ही प्रभावशाली है, जो कि गेहूं तथा चावल से लगभग 4- तथा 11- गुणा अधिक है। क्योंकि अन्य सब्जियों जैसे गाजर, प्याज तथा कद्दू की तुलना में आलू में विटामिन ‘सी` भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है इससे एक व्यक्ति की रोजाना की जरूरत पूरी हो जाती है। अध्य्यनों से यह प्रदर्शित होता है कि छिलके सहित खुदाई किए गए 100 ग्राम ताजे उबले आलू से एक बच्चे की 80 प्रतिशत तथा एक वयस्क की 50 प्रतिशत तक विटामिन ‘सी` की जरूरत को पूरा किया जा सकता है। आलू एक कम ऊर्जा (97 kcal/100 ग्राम ताजा भार) वाला खाद्य पदार्थ है, क्योंकि इसमें वसा (< 0.1 प्रतिशत) तथा कैलोरी कम होती है। अतः यह धारणा गलत है कि आलू खाने से मोटापा बढ़ता है। वास्तव में जब कंद को तला (फ्राई) या संसाधित किया जाता है तो इसकी ऊर्जा मूल्य में वसा की मात्रा बढ़ जाती है। इसके विपरीत, आलू को मोटापा कम करने के लिए एक आदर्श आहार माना जा सकता है। यह कहा जाता है कि एक स्वस्थ व्यक्ति एक दिन में 3 किलोग्राम आलू के सेवन से अपनी दैनिक ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर सकता है। कुल मिलाकर, आलू एक उच्च पौष्टिक, आसानी से पचने वाला और संपूर्ण आहार है। यह एक अनूठा खाद्य आहार है क्योंकि इसे उबालकर या तल कर या संसाधित करके तीनों तरह से समान स्वादिष्ट रूप में उपभोग में लाया जा सकता है। शायद ही किसी अन्य खाद्य फसल में ऐसी अंतर्निहित क्षमता होगी जैसे कि आलू में होती है क्योंकि इससे कई प्रकार के संसाधित उत्पाद बनाए जाते हैं, जिसे हर उम्र के लोगों द्वारा उपयोग में लाया जाता है।

भारत में आलू कैसे आया ?

आलू भारत का देशज नहीं है। इसकी उत्पत्ति का मूल स्थान पेरू के एंडीज में लेक टिटिकाका हाई तथा दक्षिण अमेरिका में बोलिविया के आसपास माना जाता है। पेरू के पुरातत्व खुदाई में 8000-6000 बीसी में आलू के अवशेष खोजे गए हैं। यह माना जाता है कि प्राचीन एंडियन (दक्षिण अमेरिकी निवासी) जिन्हें उस काल में पर्वतों (ऊंचे स्थानों) पर प्रवास के लिए मजबूर किया गया था ने सर्वप्रथम उस समय आलू को उगाना प्रारंभ किया। आलू को उगाने के पुराने प्रलेखों में आलू को जनसाधारण तथा उत्पीड़ित लोगों का आहार माना जाता रहा है। एंडियन तथा बाद में यह इन्कास सभ्यता में फैला जहां इसे पापा के नाम से जाना जाता है। हजारों वर्षों तक यह महान एंडियन सभ्यता का मुख्य आहार रहा है किंतु शेष विश्व के लिए यह अज्ञात था।

प्राचीन एंडियन (दक्षिण अमेरिकी निवासी) द्वारा अपनी पौराणिक कथाओं तथा धार्मिक अनुष्ठानों में उल्लेख किया गया है। मोरे रेमी आलू उत्सव इसके मूल जन्म स्थान, एंडेज (एंडीज का आलू खजाना, कृषि से संस्कृति की ओर’, अंतरराष्ट्रीय आलू केंद्र, लीमा, 2001 से रूपांतरित) में आज भी मनाया जाता है। नई दुनिया की खोज के साथ ही आलू को अन्य फसलों जैसे मकई तथा तंबाकू से साथ यूरोप में लाया गया। आलू से जुड़ी एक या दूसरी भ्रांतियों के कारण कई शताब्दियों तक यूरोपीय जन समुदाय ने आलू को स्वीकार नहीं किया। अंग्रेजों ने इसे स्पड नाम दिया जो कि समाज में अस्वास्थकर आहार के निवारण हेतु एक परिवर्णी शब्द है (इस अपमानजनक नामकरण के लिए जिम्मेदार संगठन)। लेकिन एक बार जो आलू ने यूरोपीय समाज में अपनी पकड़ बनाई तो इसने सारा परिदृश्य ही बदल कर रख दिया। इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि आलू के कारण यूरोप में औद्योगिक क्रांति और भरण पोषण संभव हुआ। कुख्यात आइरिश आलू अकाल हमें इस बात की याद दिलाता है कि उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ से मध्य के दौरान किस प्रकार यूरोप के लोग अपने दैनिक जीवन निर्वाह के लिए आलुओं पर निर्भर रहना पड़ा था। यहां तक कि 19वीं शताब्दी के बावेरियन वार को ”आलू वार” का नाम दिया गया क्योंकि आलू का स्टॉक समाप्त होने तक यह युद्ध जारी रहा। यह दक्षिण अमेरिका के उस इन्का दौर की याद दिलाता है जब आलू की खेती के कारण युद्धरत आदिवासी समूहों के बीच कई बार भीषण युद्धों तक को स्थगित कर दिया जाता था।